21.10.11

उल्‍लू के द्वारा तांत्रिक सिद्धि।

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क्या आपको पता है, दीपावली की पूर्व संध्या पर हजारो उल्लू बलि चढाए जाते है। लक्ष्मी देवी के वाहन उल्लू की बलि लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिये दी जाती है। ये कैसी देवी है जो अपने वाहन की बलि पर प्रसन्न होती है। हर साल हजारों उल्लू जिन्हे हिमालय की तराई, मध्य प्रदेश, बिहार और पूर्वांचल के जंगलों से पकड़कर लाया जाता है। उल्लुओं की बलि देने के पीछे तर्क यह दिया जाता है कि लक्ष्मी जी ऐसी बलि से प्रसन्न होकर धनवान बनने का वरदान देती है।

वैसे भी उल्लू तांत्रिको का मनपसन्द बलि जीव है। इसके लिए जीतोड़ मेहनत करके उल्लू को ढूंढा जाता है और उसे दीवाली के एक दिन पूर्व बलि चढा दी जाती है। आज के वैज्ञानिक युग मे भी ऐसे अंधविश्वासी लोगो की कमी नही जो इस घृणित कार्य मे लिप्त है। दिल्ली में उल्लू की मन्डी लाल किले के सामने, जामा मस्जिद के पीछे, मूलचन्द फ़्लाई ओवर, मिन्टो ब्रिज, महरौली गुड़गांवा रोड और आई एन ए मार्केट मे लगती है। इस सीजन मे उल्लू की कीमतें 15 हजार से लेकर 80 हजार तक पहुँच जाती है।

आखिर हम कब सुधरेंगे? कब बन्द करेंगे बेजुबान जानवरों पर जुल्म ढाना? अव्वल तो मै नही मानता कि इससे लक्ष्मी जी प्रसन्न होंगी, ये सब तांत्रिको, पंडितो का किया धरा है। एक परसेन्ट भी यदि इस बात मे सच्चाई (अभी तक तो प्रमाणित नहीं हो सकी) है, तो लानत है ऐसे इन्सान पर जो अपने स्वार्थ के लिए बेजुबान जानवरों का खून बहाता है। हम अंधविश्वासी लोग कब जागेंगे? कब फैलेगा ज्ञान का उजाला? जिस दिन हम ढोंगी तांत्रिको और पंडितो के जाल से निकलेंगे वही दिन हमारे लिए असली दीपावली होगी।

-जितेन्‍द्र चौधरी
(मेरा पन्‍ना से साभार)
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19 सुधी पाठकों की राय:

कबीर ने कहा…

बहुत महत्वपूर्ण बात उठाई आपने.लानत है ऐसे इन्सान पर जो अपने स्वार्थ के लिए बेजुबान जानवरों का खून बहाता है, ये इंसानियत के खिलाफ है.उल्लू हों या बकरा ...धर्म के नाम पर इनकी क़ुरबानी देनी बंद होनी चाहिये.

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

----और उस इंसान पर लानत नहीं भेजी आजतक आप लोगों ने जो खाने के लिए ...एवं अपने त्योहारों पर बकरे व मुर्गों की बलि चढ़ाता है ????? इस मैं कौन सी वैज्ञानिकता है ....

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

उल्लू की बलि चढ़ाने की बात मेरे लिए बिल्कुल नयी है। मैने आजतक नहीं देखा, न सुना ही था। ताज्जुब है।

बकरे की बलि जरूर मन में जुगुप्सा पैदा करती है।

रविकर ने कहा…

बहुत बहुत बधाई ||

Yogesh ने कहा…

nonveg खाना आप कहाँ तक सही ठहराते हैं ???

फिर तो सबको शाकाहारी भी होना चाहिए...

हाँ, आपने बलि का ज़िक्र किया, उस बात से मैं १००% सहमत हूँ.... के ये प्रथा बंद होनी चाहिए..

वैसे मेरे जानने वालो में से कोई भी ये काम नहीं करता... फिर पता नहीं कौन लोग हैं जो ये काम करते हैं :)

संगीता पुरी ने कहा…

अंधविश्‍वासियों से सुधरने की आशा क्‍या की जाए ??

anshumala ने कहा…

हजारो तो नहीं हा सैकड़ो उल्लू जरुर मारे जाते है और इसे आप अंधविश्वास न कहे , ये उससे कही आगे की चीज है | पर इसमे देवी का क्या दोष भक्तो की बुद्धि भ्रष्ट हो तो देवी भी क्या कर सकती है | लालच में तो मनुष्य को बच्चो की भी बलि चढ़ा देता है तो ये तो बस उल्लू भर है | वैसे ये भी सोचने की बात है की वाकई उल्लू कौन है |

मनोज कुमार ने कहा…

सही मुद्दा उठाया है आपने। विचारोत्तेजक पोस्ट।

shikha varshney ने कहा…

उल्लू की बलि चढाना...पहली बार सुना.

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

उल्लू की बलि चढाना...पहली बार सुना.
जाकिर जी कोई प्रमाण?

Mansoor Ali ने कहा…

'उल्लुओं' ही की तो चढ़ती है बलि,
फिर नए उल्लू बना लेते है लोग,
बच गयी 'लक्ष्मी' यही तो ख़ैर है,
भेट मे क्या-क्या चढा देते है लोग !
http://aatm-manthan.com

P.N. Subramanian ने कहा…

पहले हम सोचते थे की केवल अनपढ़ लोग ही अन्धविश्वासी होते हैं परन्तु ऐसा नहीं है. इसकेलिए एक मुहिम चलानी होगी तभी शायद जनचेतना जागृत हो.

Vijai Mathur ने कहा…

वस्तुतः पढे-लिखे और तथाकथित ज्यादा काबिल लोग ही तो ऐसे अंधविश्वासों को फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं जो 'धर्म' का अर्थ ही नहीं समझना और बताना चाहते। 'कृषि-विज्ञान' पर आधारित पावन-दीपावली पर्व को अधार्मिकों ने ही 'तंत्र'और बली देने की कुप्रथा से कलंकित कर रखा है। गरीब जनता का शोषण करने के हथकंडे हैं यह सब अतः अमीर -शोषक वर्ग इन्हें खुशी से नहीं छोड़ेगा जब तक इंनका सामूहिक-सामाजिक -बहिष्कार न किया जाये,ये नहीं सुधरेंगे।

kamal ने कहा…

उल्लू की बलि होती हों,ऐसा मेरे किसी परिचित दोस्त या रिश्तेदारों तक को नहीं पता ... सुधरने की जरुरत प्रकाशोत्सव पर्व पर ऐसी बाती करने और फ़ैलाने वालों को है. चंद उल्लुओ की ये ऊल-जूलूल हरकते बेमानी है.

अन्तर सोहिल ने कहा…

उल्लू की बलि ?
पहली बार पढा है। इससे पहले कभी सुना भी नहीं।
इस बात में कितनी सच्चाई है ये तो आप ही जानें।

प्रणाम

बेनामी ने कहा…

अरे, ये तो अपने कनपुरिया जीतू भाई हैं। पर ये यहां क्‍या कर रहे हैं? ओह, साभार वाला मामला है। पर इत्‍ते बडे बडे विद्वान लोग आके बोल रहे कि पहली बार सुना, ये बात... कहीं ये लोग भी तो नहीं उल्‍लू....?
राधेलाल कनपुरिया

Yogesh ने कहा…

Murdo ko chhoo kar nahata hoon
Zindo ko maar kar khaata hoon...
Insaan ki fitrat bhi ajeeb hoti hai...


Mera sawaal ye hai, ke log antim sanskaar kar ke aane ke baad nahaate kyu h?
Kya iske peechhe koi tark hai ya ye mehaz ke pratha hai? Can there be a
scientific reason behnd this?

veerubhai ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति !धर्म भीरु समाज में उल्लुओं की ही चांदी है .लक्ष्मी का वाहन भी तो उलूक ही है .ये तांत्रिक हम ही पूज रहें हैं .पक्षी उलूक पकड़ में आ जातें हैं ये उलूक तो नेताओं से भी सम्मान पा रहें हैं .उलूक भाई चारा है भाई साहब .उलूक उलूक भाई भाई .एक मेनका बेचारी क्या करें .यहाँ तो आलम ही यह है -हर शाख पे उल्लू बैठा है ,अंजामे गुलिस्तान क्या होगा ,बर्बाद चमन के करने को एक ही उल्लू कॉफ़ी था .इनमें इन अंध विश्वाशी लोगों में पढ़े लिखे सब धान सत्ताईस सेरी हैं .

दीपक बाबा ने कहा…

भाई पशु/पक्षी बलि निंदा के पात्र हैं, चाहे किसी भी रूप में किसी भी सम्प्रदाय/धर्म में क्यों न हो..