19.1.12

अंधविश्‍वास के कुब्‍बों पर प्रकट होती देवियाँ।

हमारे देश में अंधविश्‍वास का हाल यह है कि कभी हम इसके नाम पर किसी नवजात की बलि चढ़ा देते हैं, कभी किसी हाड़-मांस की स्‍त्री को डायन करार देते हैं तो कभी जमीन जायदाद पर कब्‍जे की नियत से किसी देवी या बाबा को प्रकट करवा देते हैं। ऐसा ही एक ताजा मामला इलाहाबाद में देखने में आया, जहां मामला इतना बिगड़ा कि पुलिस को कर्फ्यू तक लगाना पड़ा। प्रस्‍तुत हैं उस सम्‍पूर्ण घटना पर युवा एवं तेज-तर्रार लेखक मनोज कुमार पाण्‍डेय के विचार- 

पिछले दिनों इलाहाबाद जिले के मऊआइमा कस्‍बे में मऊदोस्‍तपुर गाँव में अचानक से हवा उड़ कि वहाँ देवी प्रकट हो गयी हैं। कथाकथित देवी ने अपने प्रकट होने के लिए एक बड़े से बाग के बीच स्थित सेवल के पेड़ को चुना था। देवी सेमल के पेड़ पर एक कुब्‍बे के रूप में प्रकट हुई थीं। कुछ तो अपराधी तत्‍वों की सातिश, कुछ धर्म और अजग गजब के पीछे पागल लोगों के मुँहामुँही प्रचार तंत्र की वजह से अगले दो-तीन दिनों में बाग में मेले का सा माहौल बन गया। दूर-दूर से लोग तथाकथित देवी के सामने अपनी मनोकामनाएँ लेकर आने लगे। जाहिर है कि उन श्रद्धालुओं के लिए धर्म और अंधविश्‍वास के बीच अंतर करने वाली कोई पतली रेखा भी नहीं थी।

हिंदू धर्म में प्रचलित बहुदेववाद और अतवारवाद ने एक ऐसी जमीन तैयार कर दी है, जिस पर जब भी जिस देवी-देवताकी मर्जी होती है, प्रकट हो जाता है। खैर इस मामले में हुआ यह कि दस-बारह दिनों तक लगातार इस बाग पर अपराधी तत्‍वों का कब्‍जा रहा। स्‍थानीय प्रशासन लगातार मूक दर्शक बना रहा और अपराधियों को शह प्रदान करता रहा। तब हारकर बाग के मालिक ने जिलाधिकारी की शरण ली। जिलाधिकारी के हस्‍तक्षेप के बाद बाग खाली कराया गया। पर स्थिति यह थी कि देवी को प्रकट करनेवाले पेड़ को को और उसके आपास की जगह को, जो पूजास्‍थल जैसा बना दिया गया था, जस का तस छोड़ दिया गया।

इस बाग का मालिकाना हक जिस व्‍यक्ति के पास था, वह अन्‍य धर्म का व्‍यक्ति था। सो जल्‍दी ही पूरे इलाके में साम्‍प्रदायिक तनाव पनपने लगा। तब इलाहाबाद के युवा जिलाधिकारी ने खुद की उपस्थिति में कुल्‍हाड़ी से पेड़ पर प्रकट हुई तथाकथित देवी को नेस्‍तानाबूद करवा दिया। अंतत: लम्‍बे समय तक कर्फ्यू के बाद ही स्‍िथत शांत हो सकी।

ठीक ऐसा ही वाकया आज से 15-16 साल पहले इलाहाबाद के ही होलागढ़ ब्‍लॉग के मैदी नामक गाँव में घटित हुआ था। मैदी में आज तक सोमवार के दिन साप्‍ताहिक मेला लगता है। वहाँ भी देवी सेम के पेड़ में ही प्रकट हुई थीं। अभी पिछले 6 महलने के अंदर ही इसी इलाके में इस्‍माइलपुर कुरिया, धामापुर तथा अन्‍य कई स्‍थानों पर देवी के प्रकट होने के दावे किये गये।

उन सभी जगहों पर जहाँ तथाकथित देवियाँ पेड़ों पर ऊबड़-खाबड़ कुब्‍बों के रूप में प्रकट होती रही हैं, जमीन पर कब्‍जे का मामला ही प्रमुखता से आता रहा है। इसी तरह से जमीन में मूर्तियाँ आदि छुपाकर भी जमीन पर कब्‍जे की साजिश की जाती रही है। इसमें शातिर अपराधी पहले किसी के खेत या बाग या घर में जमीन के नीचे कहीं पर मूर्तियाँ छिपा देते हैं, इसके बाद वह सपना आने का ढ़ोंग करते या करवाते हैं। इसके तहत किसी को देवी या देवता का सपना आता है कि वह फलाँ जगह पर वर्षों से दबा पड़ा है और कष्‍ट में है। सपने में ही देवी या देवता यह इच्‍छा प्रकट करता है कि जिस जगह पर उसकी मूर्ति दबी पड़ी है, उसी जगह उसका मंदिर स्‍थापित करके प्राण प्रतिष्‍ठा की जाए।

धर्म के नाम पर की जाने वाली इस ठगी का शिकार आमतौर पर गरीब और असहाय लोग ही होते रहे हैं। इस तरह की घटनाओं के पीछे ठीक उसी तरह से जमीन या सम्‍पत्ति पर कब्‍जे का मामला काम कर रहा होता है, जेसे बिहार या झारखण्‍ड में महिलाओं को डायन करार दिये जाने के पीछे उनकी सम्‍पत्ति पर कज्‍बा करने का लालच भी प्रमुखता से काम करता है। जाहिर है कि इसक पीछे मुख्‍य अपराधी एक-दो ही होते हैं, बाकी तो तर्कहीन अंधविश्‍वासी लोगों की एक भीड़ होती है, जो इस तरह की घटनाओं को अंजाम देती है। इस तरह के मामलों में कोई कानूनी कार्यवाही कम ही सम्‍भव हो पाती है।
मनोज कुमार पाण्‍डेय
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9.1.12

क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथाओं के अनुवाद में आने वाली समस्याएँ एवं उनका निवारण -बुशरा अलवेरा

('क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथा लेखन' कार्यशिविर में बुशरा अलवेरा)
प्रस्तावना- विज्ञान कथाओं का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। यह एक विस्तृत क्षेत्र है, जिसे पूर्णतया वर्णित करना अत्यधिक कठिन है। अनुवाद हेतु चुनी गयी कथा, जिस भाषा में लिखी होती है, वह भाषा स्त्रोत भाषाकहलाती है जबकि जिस भाषा में कथा का अनुवाद करना होता है, उसे लक्ष्य भाषाकहते हैं।

विज्ञान कथाओं के अनुवाद में आने वाली कुछ प्रमुख समस्याएँ और उनका निवारण (सम्भावित) निम्न प्रकार हैं-

1. शीर्षक का नाम- यह अब भी बहस का एक प्रमुख मुद्दा है, कि शीर्षकों का अनुवाद होना चाहिए  अथवा नहीं, उदाहरण के लिए एलियन्स रिटर्ननामक शीर्षक का उर्दू भाषा में अनुवाद करें तो यह दूसरी दुनिया के लोगों की वापसीहोगा, जोकि कथा के आकर्षण को कम करता प्रतीत  होता है। यही कारण है कि विज्ञान कथा आधारित विदेशी फिल्मों को अनुवादित करते समय  उनके शीषर्कों को ज्यों का त्यों ही रखा जाता है। उदाहरणार्थ- स्टारवार’, ‘द डे आफटर टुमैरो’  इत्यादि।

शीर्षकों का प्रयोग दो भिन्न प्रकार से किया जाता है- स्थान अथवा किसी व्यक्ति की पहचान के लिए तथा दूसरा उसके कार्यों को वर्णित करने के लिए।

अतः उन शीर्षकों को अनुवादित नहीं किया जाना चाहिए जिन्हें नामके रुप में प्रयोग किया जाए। केवल उन्ही शीषकों की अनुवादित करें, जो किसी कार्य को वर्णित करते हो। जैसे- रिंग रोड। इस शीर्षक का अनुवाद नहीं किया जायेगा, क्योंकि यह एक नाम के रुप में प्रयुक्त हुआ है।

इस बात पर भी ध्यान देना आवश्यक है कि यदि स्त्रोत भाषाका कोई शब्द लक्ष्य  भाषामें प्रचलित है, तो उसका अर्थ क्या है? उदाहरण के लिए गुजरती तथा हिन्दी दोनों  भाषाओं में मोटाशब्द आता है, परन्तु पूर्णतया भिन्न अर्थों में।

2. शब्दकोशों का अभाव- वर्तमान विज्ञान कथा क्षेत्र में प्रान्तीय भाषाओं में वैज्ञानिक शब्दों के लिए सटीक शब्दों का अभाव है। साथ ही विज्ञान शब्दकोश उतने समृद्ध नहीं है, कि जिनसे वैज्ञानिक शब्दों  का अन्तरप्रान्तीय भाषाओं में अनुवाद हो सकें। जिसके कारण तकनीकी शब्दों के अनुवाद में विज्ञान कथा लेखकों का अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

3. शब्दों का अनुवाद- शब्दों का पृथक रुप में अनुवाद नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि शब्द अपना अर्थ’  वाक्यों से ही प्राप्त करते हैं। जैसे कि इन उदाहरणों में देख सकते हैं।
पनडुब्बी जल में समा गयीतथा पनडुब्बी आग में जल गयीइन दोनों वाक्यों में जल शब्द प्रयुक्त हुआ है, परन्तु इसका अर्थ भिन्न-भिन्न है, अर्थात् प्रथम वाक्य में पानीके अर्थ में तथा दूसरे वाक्य में अग्नि में भस्म होनेके अर्थ में।
अतः कथाओं में शब्दों के अनुवाद के बजाए विषयक विशेष अनुवाद पर अधिक बल देना चाहिए।

4. संयोजक शब्दों का प्रयोग- कुछ महत्वपूर्ण संयोजक शब्द है- जैसा कि’, ‘फिर भी’, ‘लेकिनआदि।  इनका प्रयोग शब्दों के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने में होता है। यदि अनुवाद की प्रक्रिया में इन शब्दों का त्रुटिपूर्ण प्रयोग हो जाए तो अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है।

5. यूफोमिज़्म- सांस्कृतिक भिन्नताओं का भाषा पर बहुत प्रभाव पड़ता है। कुछ भाषाओं में कटु तथ्यों को छिपा लेने अथवा उन्हे कम आक्रमक ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता होती है। भाषा के इस  व्यवहार को अंग्रेजी में यूफोमिज़्म कहते हैं।
इसी प्रकार व्यंग्य का प्रयोग भी भाषा की आक्रामकता को कम करता है। आजकल विज्ञान कथाओं में व्यंगात्मक भाषाओं का प्रचालन आरम्भ हुआ है, जो काफी प्रभावकारी सिद्ध हुआ है। इसके माध्यम से कठोर तथ्यों को भी सरलतापूर्वक पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया जा सकता है।

6. क्रियाओं का प्रयोग- क्रियाएं भिन्न-भिन्न भाषाओं में अपने भिन्न भिन्न रुपों के कारण अनुवाद में  समस्याएं उत्पन्न करती है, यदि इनके प्रयोग में कोई शंका उत्पन्न हो, तो बेहतर यही होगा कि इन्हें अनदेखा कर दिया जाए अथवा उसके अर्थ को किसी अन्य प्रकार से अनुवाद समाहित कर दिया जाए।

7. सटीकता- क्षेत्रीय/प्रान्तीय भाषाओं में कुछ निश्चित क्षेत्रों में ही सटीकता होती है। उदाहरण के लिए-किसी प्रान्त विशेष में पकाया जाने वाला कोई विशिष्ट व्यन्जन जो केवल उस क्षेत्र से ही सम्बन्धित है।  ऐसे शब्दों के लिए एक सटीक शब्द लक्ष्य भाषामें ढूंढ पाना अत्याधिक कठिन होता है।

भाषा में अस्पष्टता होने के कारण भी सटीकता पर बुरा प्रभाव पड़ता है, जैसे कि उ0प्र0 प्रान्त की कुछ क्षेत्रीय बोलियों में स्पष्ट दिखाईदेने के लिए चमकनाशब्द का प्रयोग होता है, जबकि शुद्ध हिन्दी में इसे प्रकाशमयअथवा प्रकाशित होना के अर्थ में प्रयोग किया जाता है।

अन्त में कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर दृष्टि डालते है जो सफल अनुवाद तथा सम्बन्धित समस्याओं के निवारण में लाभदायक है-

-विज्ञान कथाओं में भाषा को सदैव स्पष्ट तथा सरल रखें, ताकि पाठक अथवा श्रोता को समझने में कठिनाई न हो।
-वाक्यों को अधिक लम्बा न करें, साथ ही एक वाक्य में दो या तीन से अधिक विचारों को न डालें।
-यदि विज्ञान के क्षेत्र का कोई नया शब्द आ जाए तो उसके लिए निकटतम व सरल शब्द का प्रयोग करें।
-अनुवाद करते समय व्याकरण पर विशेष ध्यान दें
-जब भी अनुवाद करें, तो अर्थ का अनुवाद करें, न कि शब्दों का।
-पाठक अथवा श्रोता वर्ग को सदैव ध्यान में रखकर अनुवाद करें।

अतः इस प्रकार हम देखते हैं कि विज्ञान कथाओं के अनुवाद में समस्याएं हैं, परन्तु बुद्धि और युक्ति के तालमेल से इन समस्याओं को दूर किया जा सकता है।

बुशरा अलवेरा
मकान संख्या-1052, सिविल लाइन, लाइनपुरवा, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश-225001
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7.1.12

क्‍या है विज्ञान कथा ? -डॉ0 अरविंद मिश्र (What is Science Fiction?)

('क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथा लेखन' कार्यशिविर में दिया गया आधार वकतव्‍य)

विज्ञान कथा को लेकर प्रायः लोगो मे तरह तरह के कयास लगाए जाते हैं. भारत मे इसे लेकर काफी भ्रम की स्थिति है. कोई यह समझता है कि जैसे आग की कहानी, कोयले की कहानी, स्टील कि कहानी वैसे ही विज्ञान की कहानी. मगर ऐसा नही है. विज्ञान कथा दीगर साहित्यिक कहानियों की तरह ही कहानी की एक विधा है जिसमें अमूमन आने वाले कल की तस्वीरें दिखने को मिलती हैं; जबकि सामाजिक कहानियों मे अतीत या वर्त्तमान की झलक देखने को मिलती है. बस अपने भविष्य दर्शन की विशेषता के ही चलते विज्ञान कथाएं दूसरी साहित्यिक कहानियों से अलग तेवर और कलेवर रखती हैं. अन्यथा विज्ञान कथाओं और दूसरी अनेक प्रकार की कहानियों जैसे प्रेम कथाओं, रहस्य-रोमांच और जासूसी कथाओं मे कोई तात्विक अंतर नही होता.

मगर फिर भी विज्ञान कथाओं की कोई सर्वमान्य परिभाषा देना एक मुश्किल काम है, हाँ इसके बारे मे बताया या समझाया जरूर जा सकता है. महान विज्ञान कथाकार आईजक आसिमोव के अनुसार विज्ञान कथा मानव समाज अथवा व्यक्ति विशेष पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रत्याशित प्रभावों के प्रति बुद्धिजीवियों और रचनाकारों के मन में उभरने वाली साहित्यिक प्रतिक्रिया है. इसमे वर्णित होनेवाली दुनिया हमारी अपनी जानी पहचानी और परिचित दुनिया नही है बल्कि आने वाली एक दुनिया हो सकती है. अब जैसे जार्ज आर्वेल नामके ब्रितानी लेखक ने अपने मशहूर उपन्यास १९८४ मे दुतरफा संवाद वाले टीवी जैसी जुगत की कल्पना कर ली थी, भले ही आज भी अपना टीवी दुतरफा न हो पाया हो, कंप्यूटर तो दुतरफा हो चला है. यह दूर की कौड़ी आर्वेल १९३९ मे ही अपने उपन्यास मे इंगित कर चुके थे.

ऐसे अनेक उदाहरण हैं. जैसे फ्रांसीसी रचनाकार जूल्स वेर्न ने चांद की सैर का वर्णन 1860 मे ही अपने उपन्यास फ्राम अर्थ टू मून मे ही कर डाला था जो सौ सालों बाद एक हकीकत बन गया. यह है विज्ञानकथा की सर्वकालिक महत्ता. मगर यहाँ भारत मे और खासकर हिंदी मे इसे जो आदर मिलाना चाहिए था वह अभी भी नही मिल सका है.

ऐसा इसलिए भी है कि भारतीय साहित्यकार इस विधा को शुरू से ही गंभीरता पूर्वक न लेकर इसे फंतासी, अजीब गरीब कहानियों, जादू टोने, बच्चों की कहानियों के इर्द गिर्द एक हाशिये का साहित्य ही मानते रहे ...और इसे "उच्च स्तरीय", मानव समाज के करीब के साहित्य की श्रेणी से अलग हल्का फुल्का साहित्य मानने के सहज बोध की अभिजात्य सोच से ग्रस्त रहे हैं और आज भी स्थति कमोबेस ऐसी ही है. इसके पीछे इस विशिष्ट विधा की उनकी अपनी समझ की कमी ही मुख्य कारण रही है-जबकि आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने एक विज्ञान कथा उपन्यास ‘खग्रास’ लिखकर तत्कालीन हिदी साहित्कारों को इस विधा की ओर उन्मुख किया था और उनकी बेरुखी के प्रति उन्हें चेताया भी था. डॉ. संपूर्णानंद ने पृथ्वी से सप्तर्षि मंडल लिख कर भी साहित्यकारों में इस विधा की ओर रूचि जगायी थी. सन १९२४ में राहुल सांकृत्यायन ने बाइसवीं सदी लिखा तो उसके पीछे रचनाकारों को इस विधा की ओर उन्मुख करना ही था ...मगर ये विरले युग द्रष्टा रचनाधर्मी थे ...यह दुर्भाग्य ही रहा कि इन रचनाओं ने भी साहित्यकारों में इस विधा के प्रति अपेक्षित रूचि नहीं उत्पन्न की.

विज्ञान कथा मे फिक्शन और फंतासी दोनो का समावेश है. फिक्शन लातिनी शब्द है जिसका मतलब आविष्कार करना होता है और फंतासी यूनानी शब्द है जिसका अर्थ कल्पना करना है. अंग्रेजी साहित्य मे तो साइंस फिक्शन और साइंस फंतासी की अलग अलग पहचान है, मगर हिंदी मे अभी तक इन दोनो उप विधाओं के लिए 'विज्ञान कथा ' शीर्षक से ही काम चलाया जा रहा है. विज्ञान फिक्शन मे विज्ञान के ज्ञात और मान्य नियमों मे फेरबदल की कतई गुंजाइश नही रहती मगर फंतासी मे ऐसा कोई बन्धन नही रहता. विज्ञान कल्पना के नाम पर आप फंतासी मे जी भर के बेसिर पैर की हांक सकते है. खूब वैज्ञानिक गप्पबाजी कर सकते हैं, विज्ञान के ज्ञात नियमों को तोड़ मरोड़ सकते हैं. यदि आप प्रकाश की गति से भी तेज चलाने कि कोई जुगत निकाल लेते हैं तो यह विज्ञान फंतासी का नमूना है और यदि मौजूदा अंतरिक्ष यानों से अपने सौर मंडल की सैर पर नौ दिन चले अढाई कोस की रफ़्तार से भी चल कर कोई नया तीर मार लेते हैं, जैसे चांद पर हीरे की कोई खान खोज लेते हैं तो यह विज्ञान फिक्शन कि कैटेगरी मे आयेगा. एक और बात भी है-फिक्शन का आशय नयी सूझ या विचार से भी है और फंतासी का अर्थ चित्रांकनों /इमजेज से है.

आशय यह कि आपके पास यदि कोई जोरदार वैज्ञानिक आइडिया है और उस पर आप ने कहानी लिख मारी और उसका लोकेशन आने वाली दुनिया का है तो यह एक विज्ञान फिक्शन है और यदि आप अपने मन मे चांद सितारों कि दुनिया की अनेक काल्पनिक तस्वीरें बना चुके हैं तो शायद आप के दिमाग मे किसी फंतासी का कीडा कुलबुला रहा है. अब यह आप पर है कि आप किस तरह की विज्ञान कथा लिखने मे अपने को सहज पाते हैं. मगर फर्क क्या पड़ता है आपके इन दोनो तरह की रचनाओं के लिए हिंदी मे तो अभी तक एक ही कैटेगरी है-विज्ञान कथा. 

विज्ञान कथा और आम फंतासी का एक अंतर इस बात से भी स्पष्ट हो सकता है कि अगर आप आज की /मौजूदा प्रौद्योगिकी के स्तर में कोई परिकल्पित परिवर्तन करके उससे उत्पन्न कोई एक नए समाज /दुनिया से रूबरू हो जाते हैं तो वह विज्ञान कथा की एक संभावित दुनिया होगी मगर यदि आज की प्रौद्योगिकी में बदलाव के बाद भी आप किसी कथित दुनियां का दर्शन नहीं कर पा रहे हैं तो वह विज्ञान फंतासी नहीं है बस एक स्वैर-कल्पना, घोर फंतासी या मिथकों की दुनिया होगी ...आशय यह कि आज हम मौजूदा किसी भी तकनीक /प्रविधि में बदलाव से विश्वकर्मा कृत मिथकीय संरचनाओं को मूर्त रूप नहीं दे सकते, स्वर्ग नरक को साकार नहीं कर सकते- इसलिए ये विवरण महज फंतासी हैं .......विज्ञान फंतासी नहीं हैं.

हिंदी में विज्ञान कथा का अतीत और वर्तमान मील के कई पत्थरों से आलोकित है.पहली विज्ञान कथा पंडित अम्बिकादत्त व्यास ने १८८४ से १८८८ के बीच मध्य प्रदेश की तत्कालीन मशहूर पत्रिका पीयूष प्रवाह मे धारावाहिक रुप से लिखी थी जिसका नाम थाआश्चर्य वृत्तांत.फिर सरस्वती के अंक ६ वर्ष १९०० में चन्द्रलोक की यात्रा छपी जिसके लेखक थे केशव प्रसाद सिंह. ये दोनो कहानियाँ दरअसल जुल्स वर्न के जर्नी टू द सेंटर आफ द अर्थ और जर्नी फ्राम अर्थ टू द मून से काफी प्रभावित थीं. वर्न की एक और कथा-फाइव वीक इन अ वलून का भी प्रभाव चन्द्रलोक की यात्रा पर पड़ा था, जिसमे कहानी का नायक एक गुब्बारे मे चांद की सैर को उड़ चलता है. डाक्टर नवल बिहारी मिश्र और यमुना दत्त वैष्णव अशोक का इस विधा के उन्नयन मे काफी योगदान रहा. डाक्टर नवल बिहारी मिश्र ने जहाँ विदेशी विज्ञान कथाओं के हिंदी अनुवाद की कमान संभाली वैष्णव जी ने मौलिक विज्ञान कथाओं का ताना बाना बुना आधुनिक विज्ञान कथाओं के लेखन की सतत शुरुआत पिछली सदी के सातवें दशक से दिखाई देती है जब कैलाश शाह, देवेन्द्र मेवाड़ी, शुकदेव प्रसाद आदि ने इस विधा को अपनी लेखनी का स्पर्श दिया ..समकालिक सक्रिय रचनाकारों के बारे मे मैं अन्यत्र(ब्लॉग-साईंस फिक्शन इन इंडिया) पहले लिख चुका हूँ .भारत में विज्ञान कथा लेखन के एक उल्लेखनीय पड़ाव के रूप में भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति कि स्थापना १९९५ मे फैजाबाद मे हुई जिसने विज्ञान कथा लेखन को संगठित स्वरूप देने का प्रयास आरम्भ किया है. डाक्टर राजीव रंजन उपाध्याय इसके अध्यक्ष हैं.

विज्ञान कथा के भारतीय अध्याय में तस्लीम के इस आयोजन ने एक और सुनहला पृष्ठ जोड दिया है और यह हमारे लिए गौरव की बात है कि वैश्विक विज्ञान कथा के एक जाने माने हस्ताक्षर डॉ. अनिल मेनन इन क्षणों के साक्षी बन रहे हैं ...और मुझे ऐसा लग रहा है कि मौजूदा आयोजन हमारी अपनी समकालिक दुनियाँ में न होकर किसी अन्य वैकल्पिक दुनिया में मूर्तमान हो रहा है जिसमें मेनन साहब एक कालयात्री हैं ....एक नया इतिहास रच उठा है.....
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31.12.11

लखनऊ में सम्‍पन्‍न हुआ विज्ञान कथाओं पर केन्दित दो दिवसीय कार्यशिविर

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में दीप प्रज्‍जवन एवं सरस्‍वती की प्रतिमा पर माल्‍यार्पण करते सर्वश्री अनिल मेनन, हेमंत कुमार, सीएम नौटियाल एवं डॉ0 अरविंद मिश्र
विज्ञान प्रसार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्‍ली एवं ‘टीम फॉर साइंटिफिक अवेयरनेस ऑन लोकल इश्‍यूज इन इंडियन मॉसेस’ (तस्‍लीम) के संयुक्त तत्वाधान में “क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथा लेखन” विषयक दो दिवसीय कार्यशिविर का आयोजन लखनऊ स्थित नेशनल पी0जी0 कालेज के सभागार में दिनांक 26 एवं 27 दिसम्‍बर, 2011 को किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन दिनांक 26 दिसम्‍बर, 2011 को अपराह्न 2.00 बजे हुआ। उद्घाटन सत्र में अपना बीज वक्‍तव्‍य देते हुए भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति के सचिव डॉ0 अरविंद मिश्र ने कहा कि विज्ञान कथा साहित्‍य की एक ऐसी विधा है, जिसकी एक परिभाषा देना सम्‍भव नहीं है। यही कारण है कि इसकी अनेकानेक परिभाषाएँ दी गयी हैं। यह एक तरह से विज्ञान कथा की विराटता को उद्घाटित करता है।

कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि अंग्रेजी साइंस फिक्‍शन के विश्‍वविख्‍यात हस्‍ताक्षर श्री अनिल मेनन ने कहा कि हिन्‍दी लेखकों में भी रोचक विज्ञान कथाएँ लिखने का माद्दा है और वह लिख भी रहे हैं, लेकिन अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में कम भागीदारी के चलते कथाकार विज्ञान लेखन को भविष्‍य के रूप में नहीं देख रहे। इस अवसर पर उन्‍होंने अपने जीवन के अनुभव को बताते हुए कहा कि वे इंजीनियरिंग के छात्र रहे हैं। लेकिन पी-एच0डी0 के दौरान उन्‍हें सिएटल में एक विज्ञान कथा लेखन वर्कशाप में भाग लेने का अवसर मिला, जिसने मेरा जीवन बदल दिया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की “विज्ञान-कथा-लेखन” कार्यशाला पूरे देश में समय-समय पर होनी चाहिए और कार्यशाला 2-3 दिनों के बजाए 1-2 हफ्तों की होनी चाहिए ताकि प्रतिभागियों को सीखने का पूरा मौका मिल सके।

वरिष्ठ विज्ञान-कथाकार श्री देवेन्द्र मेवाड़ी ने अपने उद्बोधन में कहा कि चीन ने सन 2002 में ‘साइंस-फिक्शन’ लेखन की शताब्दी मनाई। जबकि अपने भारत में हिन्दी ‘साइंस-फिक्शन’ लेखन का इतिहास सौ वर्षों से भी पुराना है और इतना पीछे चल रहा है। उन्होंने बताया कि राहुल संकृत्यायान, हरिवंश राय बच्चन और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रविन्द्र नाथ ठाकुर जैसे साहित्यकार का सहयोग इस विधा को मिलने के पश्च्यात भी ‘हिन्दी विज्ञान-कथा लेखन’ को अभी बहुत दूरी तय करनी है, जिसमें हमारा-आपका सहयोग बहुत आवश्यक है। प्रशासनिक अधिकारी श्री हेमंत कुमार ने युवा कथाकारों को ‘विज्ञान-कथा’ कैसे लिखें इसकी सलाह दी। उन्होंने बताया कि ‘साइंस-फिक्शन’ में कविताएँ और ‘हाईकू’ भी लिखी जा रही हैं और इस क्षेत्र में इसकी बहुत सम्भावना है।

अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ0 सी0एम0 नौटियाल ने बताया कि विज्ञान-कथा में साहित्य की साथ-साथ ‘विज्ञान’ का तथ्य बेहद आवश्यक है। उन्होंने “फिक्शन” और “फेंतासी” में भी अंतर बताया और कहा कि ‘विज्ञान-कथा’ में फंतासी नहीं बल्कि साइंस फिक्शन होना चाहिए। सत्र में “साइंस फिक्शन इन इंडिया” (डॉ0 अरविंद मिश्र) और “बुढ्ढा फ्यूचर” (जीशान जैदी) पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया। द्वितीय सत्र में आमंत्रित वक्ताओं ने प्रतिभागियों के साथ विज्ञान कथा पर चर्चा की और उन्‍हें विज्ञान कथा लेखन के लिए प्रोत्साहित किया |

मंचासीन सर्वश्री शुकदेव प्रसाद, जीशान जैदी, चंदन सरकार
कार्यक्रम का दूसरा दिन तीन सत्रों में विभाजित रहा। पहले सत्र में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘जीनोम यात्रा’(विनीता सिंघल), ‘इसरो की कहानी’ (वसंत गोवरीकर) एवं ‘विज्ञान और आप’ (जी0जे0 लवकरे) पुस्तकों का लोकर्पण किया गया। यह कार्यक्रम इस मायने में अनोखा रहा कि इन पुस्तकों का लोकार्पण कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागियों ने किया। इस सत्र में डॉ0 अरविंद मिश्र, डॉ0 देवेन्द्र मेवाड़ी, श्री पंकज चतुर्वेदी एवं डॉ0 विनीता सिंघल ने अपने विचार रखे। सभी वक्ताओं ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि विज्ञान लेखन में सरल भाषा में इतनी रूचिकर और उपयोगी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। इससे विज्ञान लोकप्रियकरण में निश्‍चय ही सफलता मिलेगी।

कार्यक्रम के अगले सत्र में भारतीय भाषाओं में लिखी जा रही विज्ञान कथाओं पर चर्चा की गयी, जिसमें श्री चंदन सरकार ने बंगला की विज्ञान कथाओं का समृद्ध परम्परा को रेखांकित किया। इसी क्रम में जीशान हैदर जैदी ने उर्दू की विज्ञान कथाओं का परिचय देते हुए कहा कि उर्दू के पहले विज्ञान कथाकार लखनऊ से रहे हैं। चर्चा के इस क्रम में अमित कुमार ओम ने मराठी विज्ञान कथाओं के बारे में बताते हुए इस बात पर जोर दिया किया कि यदि विज्ञान कथाकार स्वयं को स्थानीय मुद्दों, मान्यताओं और बिम्बों का प्रयोग करें, तो वे अपनी बात को ज्यादा प्रभावी बना सकते हैं। इस सत्र की चर्चा के दौरान यह बात भी निकल कर सामने आई कि हिन्‍दी की तुलना में मराठी और बंगला का विज्ञान कथा साहित्‍य काफी सम्‍पन्‍न है। यदि इन भाषाओं में रची गयी विज्ञान कथाओं को हिन्‍दी में अनुदित करके प्रस्‍तुत किया जाए, तो इससे जहाँ एक ओर हिन्‍दी विज्ञान कथा साहित्‍य समृद्ध होगा, वहीं उसे पढ़कर नए रचनाकार विज्ञान कथा लिखने के लिए भी प्रेरित हो सकेंगे।

भारतीय विज्ञान कथाएं किस तरह से जन-जन के बीच स्थापित हो सकती हैं, किस प्रकार से वे आम पाठकों को अपने से जोड़ सकती हैं, इस बारे में ‘विज्ञान कथाओं के वैश्विक घटक और अनुवाद कार्य’ सत्र में श्री विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी ने विस्तार से चर्चा की। इसी क्रम में हरीश गोयल ने वैश्विक विज्ञान कथाओं के बारे में बताते हुए हिन्‍दी विज्ञान कथाओं पर उनके प्रभाव को रेखांकित किया। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए युवा पत्रकार डॉ0 मुकुल श्रीवास्तव ने साहित्य और विज्ञान के अन्तर्सम्बंध की चर्चा करते हुए कहा कि हमें विज्ञान कथाओं के आलोचनात्मक पहलू को भी ध्यान में रखा होगा और विज्ञान कथाओं को इससे जूझना होगा। इस क्रम में बुशरा अलवेरा ने विज्ञान कथाओं के अनुवाद में आने वाली समस्याओं तथा संभावनाओं की बात की और शब्द की जगह अर्थ के महत्व पर बल दिया।

सर्वश्री मुकुल श्रीवास्‍तव, बुशरा अलवेरा, सुभाष राय, विष्‍णुप्रसाद चतुर्वेदी, हरीश गोयल एवं कार्यक्रम के प्रतिभागी छात्र-छात्राएं
दैनिक ‘जनसंदेश टाइम्‍स’ के सम्‍पादक डॉ0 सुभाष राय ने अपने अध्‍यक्षीय उद्बोधन में सम्‍बोधित करते हुए कहा कि हमारा भारतीय समाज प्रारम्भ से ही एक वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पन्न समाज रहा है, किन्तु धीरे धीरे हम उस सबसे कटते चले गये और आज हालत यह है कि कोई विज्ञान को पढ़ना नहीं चाहता है, सरकारी विभागों में वैज्ञानिकों के हजारों पद खाली पड़े हुए हैं। यह हमारी सरकारी नीतियों का दुष्परिणाम है। हमें इसके बारे में सोचना होगा। समाज में विज्ञान के बारे में जागरूकता फैलानी होगी। और इस काम में विज्ञान कथाएं सहायक हो सकती हैं।

कार्यक्रम के दौरान शामिल प्रतिभागियों ने विज्ञान कथाओं के सम्‍बंध में अपनी जिज्ञासाओं और शंकाओं को विज्ञान कथाकारों के समक्ष रखा। उन्‍होंने इस दौरान रची गयी अपनी रचनाओं का पाठ भी किया। विषय विशेषज्ञों ने उन रचनाओं का आकलन करके उसमें से 6 क्षेष्‍ठ विज्ञान कथाओं का चयन किया गया। इन चुने गये रचनाकारों को डॉ0 अपर्णा सिंह ने विज्ञान प्रसार द्वारा प्रकाशित पुस्‍तकें पुरस्‍कार स्‍वरूप प्रदान कीं।

इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक एवं तस्‍लीम के महामंत्री डॉ0 ज़ाकिर अली रजनीश ने कार्यक्रम के विशिष्‍ट अतिथियों को अंगवस्‍त्रम पहना कर सम्‍मानित किया। उन्‍होंने कहा कि हिन्‍दी विज्ञान कथा की शुरूआत हुए 100 साल से अधिक हो गये हैं, लेकिन इसके बावजूद यह विधा अपनी पहचान के संकट से ग्रस्‍त है। इसलिए यह आवश्‍यक हो गया है कि विज्ञान कथाकार अपना भी अवलोकन करें और यह जानने का प्रयत्‍न करें कि आखिर वे कौन से कारक हैं, जो इन स्थितियों के लिए जिम्‍मेदार हैं।

27.12.11

विज्ञान कथाएं भारतीय विज्ञान के खोए हुए गौरव को हासिल करने में मददगार हो सकती हैं

27 दिसंबर 2011
हमारा भारतीय समाज प्रारम्भ से ही एक वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पन्न समाज रहा है, किन्तु धीरे धीरे हम उस सबसे कटते चले गये और आज हालत यह है कि कोई विज्ञान को पढ़ना नहीं चाहता है, सरकारी विभागों में वैज्ञानिकों के हजारों पद खाली पड़े हुए हैं। यह हमारी सरकारी नीतियों का दुष्परिणाम है। हमें इसके बारे में सोचना होगा। समाज में विज्ञान के बारे में जागरूकता फैलानी होगी। और इस काम में विज्ञान कथाएं सहायक हो सकती हैं।

उपर्युक्त विचार प्रखर रचनाकार और पत्रकार श्री सुभाष राय ने क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथा लेखन विषयक दो दिवसीय कार्यषिविर के समापन समारोह में अध्यक्षीय भाषण देते हुए कही।


आज का कार्यक्रम मुख्य रूप से तीन सत्रों में विभाजित रहा, जिनमें पहले सत्र में नेषनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाषित जीनोम यात्रा’, इसरो की कहानीएवं विज्ञान और आपपुस्तकों का लोकर्पण किया गया। यह कार्यक्रम इस मायने में अनोखा रहा कि इन पुस्तकों का लोकार्पण कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागियों ने किया। इस सत्र में डॉ0 अरविंद मिश्र, डॉ0 देवेन्द्र मेवाड़ी एवं एवं डॉ0 विनीता सिंघल ने अपने विचार रखे। सभी वक्ताओं ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि विज्ञान लेखन में सरल भाषा में इतनी रूचिकर और उपयोगी पुस्तकें प्रकाषित हो रही हैं। इससे विज्ञान लोकप्रियकरण में निष्चय ही सफलता मिलेगी। इस अवसर पर नेशनल बुक ट्रस्ट के सहायक संपादक ने बच्चों द्वारा किताबों के लोकार्पण कराने को लेकर बताते हुए कहा कि इस लोकार्पण समारोह में जितने बच्चों ने भाग लिया है, निश्‍यय ही वे इससे बहुत उत्साहित होंगे और इस घटना को अपनी स्मृतियों में संजो कर स्वयं को सृजनात्मक कार्यों में लगा सकेंगे।

कार्यक्रम के अगले सत्र में भारतीय भाषाओं में लिखी जा रही विज्ञान कथाओं पर चर्चा की गयी, जिसमें श्री चंदन सरकार ने बंगला की विज्ञान कथाओं का समृद्ध परम्परा को रेखांकित किया। इसी क्रम में जीशान हैदर जैदी ने उर्दू की विज्ञान कथाओं का परिचय देते हुए कहा कि उर्दू के पहले विज्ञान कथाकार लखनउ से आए हैं। इसी क्रम में अमित ओम ने मराठी विज्ञान कथाओं के बारे में बताते हुए इस बात पर जोर दिया किया कि यदि विज्ञान कथाकार स्वयं को स्थानीय मुद्दों, मान्यताओं और बिम्बों का प्रयोग करें, तो वे अपनी बात को ज्यादा प्रभावी बनाते हैं। इस क्रम में उन्होंने मराठी विज्ञान कथा के लोकप्रिय हस्ताक्षरों की चर्चा करते हुए इस दिषा में जयंत विष्णु नार्लीकर के विशेष प्रयासों का जिक्र किया।

भारतीय विज्ञान कथाएं किस तरह से जन-जन के बीच स्थापित हो सकती हैं, किस प्रकार से वे आम पाठकों को अपने से जोड़ सकती हैं, इस बारे में विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी ने विस्तार से प्रकाश डाला। इस क्रम में हरीष गोयल ने विज्ञान कथाओं के विस्तृत फलक पर प्रकाष डाला। इस क्रम में युवा पत्रकार मुकुल श्रीवास्तव ने साहित्य और विज्ञान के अन्तर्सम्बंध की चर्चा करते हुए कहा कि हमें विज्ञान कथाओं के आलोचनात्मक पहलू को भी ध्यान में रखा होगा और विज्ञान कथाओं को इससे जूझना होगा। इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए बुशरा अलवेरा ने विज्ञान कथाओं के अनुवाद में आने वाली समस्याओं तथा संभावनाओं की चर्चा की और शब्द की जगह अर्थ को महत्व देना चाहिए।

कार्यक्रम के समापन समारोह में मुख्य अतिथि ने कार्यषिविर के दौरान लिखी गयी रचनाओं में से 6 श्रेष्ठ प्रतिभागियों को विज्ञान प्रसार द्वारा प्रकाषित पुस्तकें प्रदान कीं और उनका उत्साह वर्द्धन किया। कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागियों ने इस कार्यक्रम के बारे में उत्साह व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम समय-समय पर आयोजित किये जाने चाहिए। इससे हम लोगों के भीतर जो प्रेरणा के अंकुर जन्मे हैं, वे निश्‍यय ही आगे चलकर नए आयाम तय करेगा।


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