28.5.12

हिन्‍दी माध्‍यम से पहली बार होने जा रहा है अन्‍तर्राष्‍ट्रीय विज्ञान संचार सम्‍मेलन

वैज्ञानिक दृष्टीकोण तथा चेतना जगाने में संचार माध्यमों की भूमिका पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन

 

सीएसआईआर-निस्‍केयर, विज्ञान प्रसार, एनसीएसटीसी, एवं एनसीएसएम देश में संचार माध्‍यमों के द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण जगाने के उद्देश्‍य से एक अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन करने जा रहे हैं, जोकि 29 एवँ 30 मई, 2012 को इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्‍चरल रिसर्च, नास्‍क काम्‍प्‍लेक्‍स, पूसा, नई दिल्‍ली में सम्‍पन्‍न होगा। पहली बार हिन्‍दी माध्‍यम में आयोजित हो रहे इस सम्‍मेलन में देश के कोने-कोने से आए हुए प्रतिभागियों के साथ कुछ विदेशी संचारक भी भाग लेंगे।

 

सम्‍मेलन में मुख्‍य रूप से जिन बिन्‍दुओं पर चर्चा होगी, वे निम्‍न हैं:

विज्ञान संचार का इतिहास- भूतकाल से सीख।

भारतीय भाषाओं के माध्‍यम से विज्ञान संचार-ऐतिहासिक तथा समकालीन चलन

विभिन्‍न माध्‍यमों से विज्ञान- रेडियो, टेलिविजन तथा इलेक्‍ट्रानिक मॉस मीडिया

हिन्‍दी में विज्ञान पत्रकारिता- सम्‍पादन, प्रकाशन की चुनौतियाँ

स्‍वयँ करें विज्ञान, विज्ञान संचार के लिए सृजनात्‍मक साधन

वैज्ञानिक चेतना जगाने में विज्ञान संग्रहालयों तथा विज्ञान केन्‍द्रों की भूमिका

विज्ञान आन्‍दोलन (जन विज्ञान आन्‍दोलन, पर्यावरणीय आन्‍दोलन एवँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण

विकास संचार (स्‍वास्‍थ्‍य, पारिस्थितिकी, कृषि, प्रौद्योगिकी आजीविका तथा सशक्तिकरण)

इंटरनेट में हिन्‍दी- वर्तमान स्थिति और भविष्‍य की चुनौतियाँ

वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास में शैक्षिक संस्‍थानों की भूमिका

वैज्ञानिक चेतना जगाने में विज्ञान कथाओं का योगदान

मल्‍टीमीडिया में विज्ञान (भारतीय भाषाओं में साफ्टवेयरों का विकास)

शैक्षिक क्षेत्र में विज्ञान संचार (विज्ञान क्‍लब, परीक्षा तथा प्रतियोगिता, प्रदर्शिनी इत्‍यादि)

 

स सम्‍मेलन में दिल्‍ली में रहने वाले प्रमुख विज्ञान संचारकों के साथ-साथ देश के कोने-कोने से अनेक चर्चित विज्ञान संचारक/ब्‍लॉगर भाग लेने के लिए आ रहे हैं। बाहर से आने वाले प्रमुख विज्ञान संचारकों में डॉ0 अरविंद मिश्र, डॉ0 जाकिर अली रजनीश, डॉ0 के0के0 मिश्रा, डॉ0 मनोज मिश्र, श्री जीशान हैदर जैदी, श्री दर्शनलाल बवेजा, श्री विष्‍णु प्रसाद चतुर्वेदी, सुश्री बुशरा अलवेरा, श्री इरफान ह्यूमन, श्री उदय किरौला, श्री शशांक द्विवेदी आदि। इनके साथ ही दिल्‍ली के चर्चित विज्ञान संचारक तथा विज्ञान प्रसार एवं एनसीएसटीसी में कार्यरत प्रमुख विज्ञान संचारक भी इसमें शामिल होंगे।

 

सम्‍मेलन के समापन सत्र के मुख्‍य अतिथि प्रो0 यशपाल होंगे। उनके अतिरिक्‍त समापन समारोह में चर्चित नृत्‍यांगना मल्लिका साराभाई, तथा अभिनेता फारूख शेख भी विशिष्‍ट वक्‍ता के रूप में उपस्थित रहेंगे। इस कार्यक्रम की मुख्‍य समन्‍वयक श्रीमती दीक्षा बिष्‍ट (वैज्ञानिक जी) तथा सह समन्‍वयक श्री गौहर रजा (वैज्ञानिक जी) हैं।


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20.5.12

खुलेआम क्‍यों बिकता है ज़हर?


सल्‍फास एक ऐसा कीटनाशक है, जो बहुत कम समय के भीतर जान ले सकता है। पर यह बाजार में आसानी से उपलब्‍ध है। इसी तरह कृषि में काम आने वालीं कई कीटनाशक दवाइयां भी आदमी के लिए बहुत खतरनाक हैं। लेकिन उत्‍तर प्रदेश में इन जहरीले रसायनों की बिक्री के लिए कोई मानक नहीं हैं।

सल्‍फास इधर काफी सुर्खियों में रहा। एन0आर0एच0एम0 घोटाले के आरोपी डॉ0 ए0के0 शुक्‍ला को सीबीआई पकड़कर ले गई, उनसे पूछताछ किया और जब 20 घंटे बाद जेल भेजे गए, तो वहाँ उनके मोजे से सल्‍फास मिला। बड़ा हल्‍ला हुआ। ताजा घटना में लखनऊ के एडीएम विनोद राय की जान भी सल्‍फास निगल जाने में चली गयी। आए दिन इस तरह की खबरें आती रहती हैं कि किसी ने सल्‍फास खाकर जान दे दी।

आत्‍महत्‍याओं में अधिकाँश लोग कीटनाशकों का इस्‍तेमाल करते हैं। कीटनाशक की बाजारों में आसानी से उपलब्‍धता भी इसका एक बड़ा कारण माना जा सकता है। इस व्‍यवसाय से जुड़े लोगों का मानना है कि जब तक इसकी बिक्री के लिए कोई मानक नहीं बनाए जाते, तब तक इसका सेवन करके जान देने वालों का सिलसिला खत्‍म नहीं होगा।

सल्‍फास का इस्‍तेमाल प्राय: अनाजों के भंडारों में कीटनाशाक के रूप में किया जाता है। राजधानी के अलावा प्रदेश के किसी भी जिले में कहीं भी इसकी आसानी से उपलब्‍धता है। इसीलिए इसका दुरूपयोग बढ़ा है। मध्‍य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु सहित कई राज्‍यों में कीटनाशक दवाइयों में किन-किन जहरीले पदार्थों का सेवन किया जाता है, इसका उल्‍लेख किया जाता है। इसके साथ ही इन राज्‍यों में इस तरह की दवाइयों की बिक्री के कई मानक हैं, जिसके चलते इस तरह कीदवाइयों को आसानी से हासिल नहीं किया जा सकता है।

कीटनाशक का जो भी इस्‍तेमाल जान देने के लिए करता है, उसके बचने की संभावना काफी कम रहती है। यदि इसके सेवन के तुरंत बाद ही नमक के पानी का सेवन करा दिया जाए, तो बचने की कुछ संभावना रहती है या फिर अस्‍पताल पहुंचने पर तत्‍काल एप्रोपिन का इंजेक्‍शन दे दिया जाए, तो सल्फास खाने वाले व्‍यक्ति को बचाया जा सकता है।

लेकिन यदि इसे खाने वाला व्‍यक्ति किसी तरह बच भी जाता है, तो भी इसका दुष्‍प्रभाव समाप्‍त नहीं होता। इसमें पाए जाने वाले कई ऐसे तत्‍व होते हैं, जो खून में घुल जाते हैं और कैंसर जैसी भयानक बीमारियों की वजह बनते हैं। इसके अतिरिक्‍त इसके प्रभाव से शरीर के कई अंगों के प्रभावित होने की भी संभावना रहती है।

इसीलिए यह जरूरी है कि इसकी बिक्री के सम्‍बंध में कठोर नियम बनाए जाएँ, जिससे सल्‍फास सहित अन्‍य कीटनाशक सिर्फ वास्‍तविक जरूरत वाले व्‍यक्ति को ही उपलब्‍ध हो सकें और भावावेश में जान देने की कोशिश करने वाले लोगों को बचाया जा सके।(डेली न्‍यूज नेटवर्क)

13.5.12

भारतीय वैज्ञानिकों के विचार, शोध और उनकी जीवन शैली से रूबरू कराती एक अनोखी पुस्तक -रवीन्द्र प्रभात



विज्ञान शब्द आते ही हमारे कुछ पश्चिम परस्त मित्रों  की गर्दन अनायाश ही पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। बड़े फ़क्र से कहेंगे कि विज्ञान पश्चिम की देन है और सभ्यता भारत की देन। यह भारतीय समाज की एक बड़ी बिडंबना है कि हम न तो भारत के महान वैज्ञानिकों और उनके द्वारा किए गए महान कार्यों को समझ पाते हैं और न वैश्विक प्रगति मे भारतियों के अवदान को ही। सच तो यह है कि भारतीय संस्कृति का कोई भी गंभीर अध्येता यह देखकर आह्लादित हुये बिना नहीं रह सकता कि यहाँ विज्ञान के क्षेत्र मे भी असाधारण शोध हुये हैं वह भी साधन और सूचना की न्यूनता के बावजूद।

यह वही देश है जो आर्यभट्ट के रूप मे एक ऐसा खगोल वैज्ञानिक  पाया है जिसने पूरे विश्व को गिनती की गणना के लिए  शून्य दिया। ब्रह्मांड  के रहस्यों को पहली बार  दुनिया के सामने रखा। चरक पहले चिकित्सक थे जिन्होने पाचन, चयापचय और शरीर प्रतिरक्षा की अवधारणा को दुनिया के सामने रखा। आपको जानकार यह आश्चर्य होगा कि प्लास्टिक सर्जरी के पिता सुश्रुत भी इसी देश के निवासी थे। गणितज्ञ और खगोलशास्त्री भास्कराचार्य को कौन नहीं जानता, जो उज्जैन स्थित ज्योतशीय वेधशाला के प्रधान थे। रेडियो विज्ञान के पिता जगदीश चंद्र वसु से लेकर मिसाइल मैन ए पी जे अब्दुल कलाम तक हमारे देश में महान वैज्ञानिकों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है जिन्होंने अपने शोध और अन्वेषण से समूची दुनिया को चौंका दिया।

जहाँ तक आधुनिक भारतीय विज्ञान के परिदृश्‍य की बात है तो इस भूमि में जन्में मनीषियों ने पूरे विश्व को अनवरत अपने ज्ञान से सींचना जारी रखा है। देश में ही नहीं विदेशों मे भी भारतीय वैज्ञानिक फैले हुए हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर हम क्या पढ़ रहे हैं और हमें क्या पढ़ना चाहिएजब तक प्रत्येक भारतीय पश्चिम की श्रेष्ठता और अपनी हीनता के बोध की प्रवृत्ति को नहीं त्यागता तब तक भारत विश्व के सर्वोच्च शिखर पर नही पहुँच सकता। ऐसे में हमें आवश्यकता है यह जानने की कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत नें इस विश्व को क्या दिया।

ऐसी ही एक पुस्तक मुझे पिछले  दिनों प्राप्त हुयी जिसमें भारतीय विज्ञान परंपरा और प्रमुख भारतीय वैज्ञानिकों  के महत्वपूर्ण अवदानों की चर्चा हुई है, वह भी उनके जीवन वृत के साथ। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की बाल साहित्य संबर्द्धन योजना के अंतर्गत प्रकाशित इस पुस्तक का उद्देश्य भारत के वैज्ञानिकों की जीवन शैली व उनके द्वारा किए गए आविष्कारों से बच्चों को अवगत कराना है। डॉ. ज़ाकिर आली रजनीश के द्वारा लिखित इस पुस्तक में अठारह महान भारतीय वैज्ञानिकों और चिकित्सकों से केवल परिचय ही नहीं कराया गया है, अपितु विभिन्न क्षेत्रों मे हुई वैज्ञानिक प्रगति और शोध को भी सरल भाषा मे प्रस्तुत किया गया है ।

अपनी पुस्तक के बारे में डॉ. रजनीश कहते हैं कि आदिकाल से ही मनुष्य ने न सिर्फ  ज्ञान-विज्ञान की नींव रखी, वरन दिन-प्रतिदिन वह प्रगति की सीढि़याँ भी चढ़ता चला गया। नि:संदेह इस प्रगति में आधुनिक वैज्ञानिकों ने भरपूर योगदान दिया है, लेकिन हमारे प्राचीन वैज्ञानिक भी इस नज़रिये से किसी से कमतर नहीं है। शिक्षार्थियों को इन वैज्ञानिकों के अवदानों से परिचित कराना इस पुस्तक का उद्देश्य है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि यह पुस्तक मूल रूप से विद्यार्थियों और आम पाठकों को लक्ष्य करके लिखी गई है, किन्तु मेरा मानना है कि इसे हर वह व्यक्ति पढ़ना चाहेगा जो आने वाली नई पीढ़ी को एक सकारात्मक दिशा देने को उत्सुक है। 150 पृष्ठ की इस पुस्तक की छपाई से लेकर पृष्ठ संयोजन तक अत्यंत आकर्षक है। भारतीय वैज्ञानिकों के विचार, शोध और उनकी जीवन शैली से रूबरू कराती एक अनोखी पुस्तक है यह। निश्चित रूप से यह पुस्तक विज्ञान परंपरा और विकास के क्षेत्र मे शोध-संदर्भ हेतु उपयोगी पुस्तक साबित होगी और शिक्षार्थियों का भरपूर मार्गदर्शन करने मे सहायक सिद्ध होगी।

पुस्तक: भारत के महान वैज्ञानिक
लेखक: डॉ. ज़ाकिर आली रजनीश
प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
पृष्ठ: 150 (पेपर बैक)
मूल्य: 150/-
समीक्षक: श्री रवीन्‍द्र प्रभात
 
पुस्‍तक में शामिल वैज्ञानिकों के बारे में जानने के लिए कृपया यहां क्लिक करें।

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29.4.12

पानी के बिन जीवन कैसे सम्‍भव है ?



हालाँकि धरती का 70.87 प्रतिशत भाग पानी से घिरा हुआ है, बावजूद इसके धरती पर पीने के पानी का जबरदस्‍त संकट विद्यमान है। इसका मुख्‍य कारण यह है कि धरती पर उपलब्‍ध 97.5 प्रतिशत जल लवणीय है और मात्र 2.5 प्रतिशत जल पीने के योग्‍य है। लेकिन उससे भी बड़ी विडम्‍बना यह है कि पीने योग्‍य जल के मात्र एक प्रतिशत हिस्‍से तक ही मानव की पहुँच है।

आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2001 में सम्‍पूर्ण विश्‍व की जनसंख्‍या 613.7 करोड़ थी, जिसके वर्ष 2050 में 903.6 करोड़ हो जाने की सम्‍भावना है। लेकिन 2050 में भी धरती पर पानी की उपलब्‍धता उतनी ही रहेगी, जितनी की आज है। इसलिए तब पानी के लिए कितनी मारा-मारी होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

एक आकलन के अनुसार विश्‍व के 80 देशों में पानी की कमी है, जिसमें से मध्‍य पूर्व, उत्‍तरी अफ्रीका, मध्‍य एशिया तथा सहारा अफ्रीकी देशों में यह समस्‍या बहुत गम्‍भीर रूप ले चुकी है। और जहाँ पर पीने के पानी की उपलब्‍धता है भी, वहाँ पर साफ पानी नहीं मिल पाता है। यही कारण है कि विश्‍व 1.2 अरब जनसंख्‍या आज भी अशुद्ध पानी का उपयोग करने के लिए अभिशप्‍त है।

उपरोक्‍त स्थितियों को देखते हुए संसार के समस्‍त देश जल संरक्षण के प्रति बेहद गम्‍भीर हो रह हैं। हमारे देश में भी सरकारी स्‍तर पर हालाँकि इसके लिए अनेक प्रयास किये जा रहे हैं, किन्‍तु जनमानस में इसके प्रति घोर लापरवाही देखने को मिलती है। यही कारण है कि घरों में न सिर्फ बेतहाशा पानी बर्बाद किया जा रहा है, वरन जाने-अनजाने में उसे प्रदूषित भी बनाया जा रहा है।
पानी की इस बर्बादी को रोकने और उसके प्रति सामाजिक चेतना जागृत करने के उद्देश्‍य से डॉ0 डी.डी. ओझा की पुस्‍तक जल संरक्षण एक सराहनीय प्रयास है। 

पुस्‍तक के लेखक डॉ0 डी.डी. ओझा भूजल विभाग में वैज्ञानिक हैं और इसके साथ ही साथ विज्ञान संचारक के रूप में भी जाने जाते हैं। डॉ0 ओझा की विज्ञान विषयक 30 से अधिक पुस्‍तकें प्रकाशित हैं तथा वे विज्ञान लेखक के चर्चित आत्‍माराम पुरस्‍कार सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्‍थाओं से पुरस्‍कृत एवं सम्‍मानित हैं।

यह पुस्‍तक आईसेक्‍ट द्वारा मध्‍य प्रदेश विज्ञान एवं तकनीकी परिषद की अनुसृजन परियोजना के अन्‍तर्गत प्रकाशित है, जिसमें जल संरक्षण से जुड़े विभिन्‍न मुद्दों पर आसान और सरल शब्‍दावली में प्रामाणिक जानकारी उपलब्‍ध करायी गयी है। इस कारण पुस्‍तक पठनीय एवं संग्रहणीय बन पड़ी है।  

पुस्‍तक: जल संरक्षण
लेखक: डॉ0 डी.डी. ओझा
श्रृंखला संपादक: श्री संतोष चौबे
प्रकाशक: आईसेक्‍ट, स्‍कोप कैम्‍पस, एन.एच.12, मिसरोद के पास, होशंगाबाद रोड, भोपाल-26 फोन: 3293214-15-16 ईमेल: aisect_bpl@sancharnet.in

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24.4.12

जीएम फसलों से सावधानी जरूरी

लेखक: भारत डोगरा
जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलों के विरोध का एक मुख्‍य आधार यह रहा है कि यह स्‍वास्‍थ्‍य व पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित नहीं हैं तथा यह असर सेजेटिक प्रदूषण के माध्‍यम से अन्‍य सामान्‍य फसलों व पौधों में फैल सकता है। इस विचार को इंडिपेंडेंट साइंस पैनल नेबहुत सारगर्भित ढंग से व्‍यक्‍त किया है। इस पैनल में एकत्र हुए विश्‍व के अनेक देशों के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों ने जीएम फसलों पर एक महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज तैयार किया, जिसके निष्‍कर्ष में उन्‍होंने कहा है- जीएम फसलों के बारे में जिन लाभों का वायदा किया गया था, वे प्राप्‍त नहीं हुए हैं व ये फसलें खेतों मेंबढ़ती समस्‍याएँ उपस्थित कर रही हैं। अब इस बारे में व्‍यापक सहमति है कि इन फसलों का प्रसार होने पर ट्रांसजेनिक प्रदूषण से बचा नहीं जा सकता है। अत: जीएम फसलों व गैर जीम फसलों का सह अस्तित्‍व नहीं हो सकता है।

सबसे महत्‍वपूर्ण यह है कि जीएम फसलों व गैर जीएम फसलों की सुरक्षा या सेफ्टी प्रमाणित नहीं हो सकी है। इसके विपरीत पर्याप्‍त प्रमाण प्राप्‍त हो चुके हैं, जिनसे इन फसलों की सुरक्षा सम्‍बंधी गंभीर चिंताएं उत्‍पन्‍न होती हैं। यदि इनकी उपेक्षा की गयी तो स्‍वास्‍थ्‍य व पर्यावरण की क्षति होगी, जिसकी पूर्ति नहीं हो सकती है।
इन फसलों से जुड़े खतरे का सबसे महत्‍वपूर्ण पक्ष कई वैज्ञानिकों ने यह बताया है कि जो खतरे पर्यावरण में फैलेंगे, उनपर हमारा नियंत्रण नहीं रह जाएगा व दुष्‍परिणाम सामने आने पर भी हम इनकी क्षतिपूर्ति नहीं कर पाएँगे। जानी-मानी बायोकेमिस्‍ट व पोषण विशेषज्ञ प्रोफेसर सूसर बारडोक्‍ज ने कहा है- अब तक की सब तकनीकें ऐसी थीं, जो नियंत्रित हो सकती थीं। पर मानव इतिहास में जीएम पहली तकनीक है, जिससे खतरा उत्‍पन्‍न हो गया, तो इस क्षति को रोका नहीं जा सकता है। इसके मनुष्‍व व अन्‍य जीवों के स्‍वास्‍थ्‍य पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
यह ध्‍यान में रखना बहुत जरूरी है कि जीएम फसलों का थोडा-बहुत प्रसार व परीक्षण भी घातक हो सकता है। सवाल यह नहीं है कि उन फसलों को थोड़ा-बहुत उगाने से उत्‍पादकता बढ़ने के नतीजे मिलेंगे या नहीं, मूल मुद्दा यह है कि इनसे जो सामान्‍य फसलें हैं, वो भी कान्‍टेमिनेट हो सकती हैं।
निष्‍ठावान वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों से जीएम फसलों के गंभीर खतरों को बताने वाले दर्जनों अध्‍ययन उपलब्‍ध हैं। जैफरी एम. स्मिथ की पुस्‍तक जेनेटिक रूलेट के 300 से अधिक पृष्‍ठों में ऐसे दर्जनों अध्‍ययनों का सार-संक्षेप या परिचय उपलब्‍ध है। इनमें चूहों पर हुए अनुसंधानों में पेट, लीवर औ आँत जैसे विभिन्‍न महत्‍वपूर्ण अंगों के बुरी तरह से क्षतिग्रस्‍त होने की चर्चा है साथ ही जेनेटिक उत्‍पादों से मनुष्‍यों में भी गंभीर स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं का भी वर्णन है।

भारत में जीएम फसलों के विस्‍तृत अध्‍ययनों से जुड़े रहे पीवी सतीश ने हाल ही में लिखा है कि आंध्र प्रदेश में उनके अध्‍ययनों से बीटी कॉटन की विभिन्‍न स्‍तरों पर विफलता की जानकारी मिली व सैकड़ों भेड़ें बीटी कॉटन खेतों में चरने के बाद मर गईं।  पर वर्ष 2006 में बीच का केन्‍द्रीकरण कर ऐसी स्थिति उत्‍पन्‍न की गयी, जिसमें ऐसा संकरित बीज बाजार में मिलना कठिन हो गया, जो जीएम मुक्‍त हो।(साभार: जनसंदेश टाइम्‍स)

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